26 फ़रवरी 2011

मजबूरी का नाम...?

लपेटनराम ने कहा-'' मै बहुत मजबूर हूँ''. 
इतना सुनना था, कि समेटनराम बोल पडा-''अरे मतलब तुम्हारा फ्यूचर ब्राईट है? तुम इस देश के प्रधानमंत्री भी बन सकते हो''. 
लपेटनराम चौंका-''तो क्या जो मजबूर होता है, वह प्रधानमंत्री बन सकता है?''
समेटनराम मुस्करा कर बोले- ''हाँ भोले, यही संभावना है. यही नियति है. तुम जिस पीड़ा के साथ बोल रहे हो, बस वही पीड़ा दिखानी चाहिए चेहरे पर'' 
लपेटनराम गदगद- ''मतलब यह है, कि  मेरे दिन फिरेंगे?''
समेटनराम ने कहा-'' जब घूरे के दिन फिर सकते है तो तुम्हारे भी फिर सकते हैं''
लपेटनराम को व्यंग्य ज्यादा नहीं समझता. उसने कहा- '' धन्यवाद भाई, तारीफ के लिये. अच्छा ये बताओ, मुझे मजबूर होने के अलावा और क्या-क्या करना होगा?'' 
समेटनराम ने कहा - ''तुम तो बस इसी मजबूरी को बनाये रखो. एक दिन कोई न कोई तुम्हारे पास आयेगा और कहेगा, क्या आप प्रधानमंत्री बनना चाहते है?' तब तुम चट से कह देना-''हाँ, वो बन सकते हैं तो हम क्यों नहीं. क्योंकि हम किसी से कम नहीं''.
  वह दिन और आज का दिन है, लपेटनराम फूला-फूला फिरता है, कि एक दिन वह भी प्रधानमंत्री बन सकता है. यही तो कहना है न कि 
देश में भ्रष्टाचार फ़ैल रहा है?...मै मजबूर हूँ. 
घोटाले हो रहे हैं? मजबूर हूँ. 
महंगाई बढ़ रही है?..मजबूर हूँ. 
नक्सल समस्या बढ़ती जा रही है? मै मजबूर हूँ. 
''मजबूर'' शब्द पर जोर देना है. ऐसा करने से तुम राजनीति में सफल हो सकते हो. जनता को उल्लू बनाने के लिये मजबूर हो जाना बड़ी कला है. जो नेता जितना बड़ा  मजबूर,  उतना बड़ा कहलाता है. वैसे भी इस वक्त देश में मजबूरवाद चल रहा है. दिल्ली से लेकर झुमरीतलैया तक हर कोई मजबूर नज़र आरहा है. पुलिस मजबूर है क्योंकि अपराधी मजबूत है. अफसर मजबूर है क्योंकि व्यापारी मजबूत है. सड़क कमजोर है क्योंकि ठेकेदार मजबूत है. जनता का सिर मजबूर है क्योंकि डंडा मजबूत है. छात्र नक़ल मारने में मजबूत है क्योंकि शिक्षक मजबूर है. इस देश में मजबूर और मजबूत का मुकाबला है. हमारे प्रधानमंत्री कमजोर हैं क्योंकि गठबंधन कि सरकार है. गठबंधन हो जाये तो मजबूर होना ही पड़ता है. पति मजबूर हो जाता है, क्योंकि पत्नी मायके जाने की धमकी देने लगाती है. गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री की हालत भी पति जैसी हो जाती है. कब कौन-सा दल सरकार के लिये मुसीबत बन जाये, कहा नहीं जा सकता, इसलिये कोई मंत्री घोटाला कर रहा है तो आँख मूँद लो. तुलसीदास जी ने भी यही सन्देश दिया है,कि 'मून्दहूँ आँख कतहू कोऊ नाहीं. इसीलिये अब तुकबंदी चल रही है, कि 
गठबंधन मजबूरी है, 
घोटाला बहुत ज़रूरी है. 
कभी मजबूरी का नाम महात्मा गांधी हुआ करता था, अब मजबूरी का नाम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है. इसलिये अगर लपेटनराम की संभावना है कि वह भी प्रधानमंत्री बन सकता है, तो गलत नहीं है.

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने तो बङे बङो की छूट्टी कर दी ,

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  2. वाह गिरीश जी,आपने तो मजबूरी को लपेट लपेट कर समेट दिया.
    सलाम.

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