2 फ़रवरी 2011

योगा यानी नया आइटम साँग

पहले सड़कों पर तमाशा दिखाने वाले मदारियों का ड्रेस कोड नहीं होता था। अब वे समझदार हो गए हैं। आजकल वे भगवा ड्रेस में नज़र आते हैं। उस दिन शहर में एक हाइटेक मदारी आया। वह भगवा ड्रेस पहने हुए था। मदारी ने डुगडुगी बजाई । भीड़ जुटी। मदारी ने पापी पेट के लिए सबके सामने अपना खुला पेट घुमाया। एक-दो गुलाटियाँ खाईं। कुछ छोटे-मोटे करामात भी दिखाए। मदारी के साथ उसका बंदर भी था। जैसे ही मदारी ने कहा-चल बजरंगी, कपालभाति कर। बंदर का कमर से गर्दन तक का हिस्सा कलाबाजियाँ खाने लगा। लोगों ने तालियाँ पीटीं। भीड़ में मदारी के लोग भी शामिल थे। पहले उन्होंने तालियाँ पीटीं। उनकी देखा-देखी दूसरे लोग भी पीटने लगे। मदारी हिट हो गया। पहले वह साँप-नेवले की लड़ाई दिखाया करता था। वह आइटम पुराना पड़ गया है। नया आइटम है योग। योग नहीं योगा। योगा इस वक्त का आइटम साँग है। हर छोटे-बड़े मदारी इसी के सहारे रोजी-राटी कमा रहे है। ढंग से पेट घुमाओ। बॉडी की लचक दिखाओ, और दिल में उतर जाओ। बॉलीवुड की तरह यह योगीवुड है।
पहले गली-मुहल्ले में सामान बेचने वाले नज़र आते थे। आजकल योगा वाले नज़र आते हैं। योगा अब कुटीर उद्योग है। बेरोजगारी से त्रस्त युवकों की कमाई का साधन। कहीं नौकरी नहीं मिल रही है तो हरिद्वार चले जाओ। कई बाबा मिल जाएंगे। उनसे योगा के टिप्स ले कर आओ। शरीर को फिट रखने के कुछ फार्मूले समझ लो। फिर भगवा लबादा ओढ़कर मजे से योगा बेचो। हाँ, कुछ श्लोक, कुछ दार्शनिक कविताएँ, कुछ अच्छे विचारों का घोल बना कर पूरा योगा-पैकेज बनाओ। अगर आप हिट न हो जाएँ तो मेरा नाम बदल देना, हाँ। लोगों को लम्बा जीवन चाहिए ताकि भोग जारी रहे। देश और समाज के लिए नहीं, सुंदरियों से मसाज कराने के लिए लोग जि़दा रहना चाहते हैं। स्वस्थ रहेंगे तो भोग करेंगे। भोग के लिए योग इसीलिए रहो निरोग। पैसे वालों के शरीर में रोगों ने घर बना लिया है। हवाई जहाजों में उड़ते हैं लेकिन डरते रहते हैं कि कब प्राण पखेरू उड़ जाएगा। बचने का एक ही उपाय है। असमय मरने से बचना है तो प्राणायाम करो। मदारी समझाता है-योग करो, स्वस्थ रहो। अनुलोम-विलोम करो। कपालभाती करो। भ्रामरी करो। धनवालों को अभी और जीना है। एक बंगले, दो कारें, तीन कारखानों से बात नहीं बन रही। इन सबको चौगुना करना है। यह तभी संभव है जब जान बची रहे। जान है तो जहान है। जान है तो हुस्न के लाखों रंग हैं। जो भी रंग देखना चाहो। इसलिए योगम् शरणम् गच्छामि।
एक कहानी है-अंधा देख नहीं सकता था, लंगड़ा चल नहीं पाता था । दोनों को मेला देखने जाना था । लंगड़ा अंधे के कंधे पर सवार हो गया था। आजकल कुछ समझदार पापी स्वामियों के कंधों पर सवार हो कर मुक्ति के मेले तक पहुँचना चाहते हैं। अब तो गोरी-चिट्टी महिलाएँ भी योग के मैदान में उतर कर कमाल कर रही हैं। बिकनीनुमा वस्त्रों में योगा सिखा रही हैं। वाह-वाह, इस योगा में कितनी संभावनाएँ हैं। तन, मन और धन। सबका आनंद है यहाँ। आय-हाय..। योगियों की बजाय योगिनियाँ ज्यादा आकर्षित करती हैं। योगा में ग्लैमर बढ़ रहा है इसीलिए तो नए दौर में इस सर्वाधिक हिट-सुपर-डूपर हिट- सांग को गाएँ और फौरन से पेश्तर 'योगम् शरणम् गच्छामि' हो जाएं ताकि 'भोगम शरणम गच्छामि' के लिये सुविधा में कोई दुविधा न रहे.  बोलो योगादेव की... जय।

2 टिप्‍पणियां:

  1. उंsssss हूं। महाराज आप सिरे से चूक गए...।


    एक बार कुछ दिन योगा करने के बाद फिर से इसी लेख पर गौर फरमाएं...

    शायद ध्‍यान की अवस्‍था में कुछ और ही पता मिल जाए... :)

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  2. बढ़िया... मै बन्दर और मदारी का नाम जानने को आतुर हूँ.

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