11 मई 2016

कविता और 'एसी'



गरमी में अगर एसी काम न करे तो कुछ कवि भयंकर रूप से बेचैन हो जाते हैं. लगभग बौराए -से. जो महाकवि किस्म के होते है, वे बाकायदा छटपटाए -से नज़र आते हैं.  एक दौर था, जब  मौसम की मार झेल कर भी कविता लिखी जाती थी, पर अब तो रंज कवि को होता है मगर आराम के साथ. आजकल मौसम अनुकूल हो तभी कविता प्रकट होती है. वरना जयहिंद।  सच्ची बात है. जब कभी 'ए.सी' काम नहीं करता न, तो किसी भी बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कवि का मूड भी नहीं बनता। मूड नहीं बनता, इस कारण हिंदी साहित्य की बड़ी क्षति होती है क्योंकि बेचारा कवि जो है सो कविता नहीं लिख पाता। उस दिन भी उस कवि  के साथ यही तो हुआ। कवि सुबह से मूड बना कर निकला था कि दफ्तर जा कर हमेशा की तरह काम नहीं करेगा। केवल फेसबुक में भांति-भांति के ज्ञान पेलेगा और कविताएँ लिखेगा। पर दफ्तर आया तो बिजली गुल। एसी चल ही नहीं रहा। इन्वर्टर भी खराब था. कविता क्या खाक होगी। कविता तो एसी की हवा पाकर बहती है। 
कवि पसीने से तर-ब-तर हो रहा था। मगर कविता बाहर निकलने का नाम नहीं ले रही थी। कविता न हुई सरकारी योजना हो गई जो आकार नहीं ले पा रही थी। कवि अफसर था। उसने लोगों को हड़काया कि क्या कर रहे हो? पता करो, बिजली अब तक क्यों नहीं आई। 
दफ्तर के अन्य कर्महीनकिस्म के चर्चित जीवों ने बताया-''बस, आने ही वाली है। इन्वर्टर ठीक होने ही वाला है।'' 
और कुछ देर बाद बिजली आ गई। एसी चालू हो गया। शीतल-मंद-समीर का झोंका शरीर से टकराने लगा। कवि का मूड बनने लगा। 
उसने लिखा-'''तपती दोपहरी में धूप के पहाड़ पर चढ़ता मनुष्य मुझे देता है चुनौती/... मैं उसके साथ कंधे-से-कंधा मिला कर चलना चाहता हूँ/ ..जलना चाहता हूँ/ ...चिलचिलाती धूप में जिंदगी बन कर।'' 
कवि ने अपनी लिखी कविता पढ़ी और समझ गया कि ये इकलौती कविता हिंदी साहित्य में इतिहास रचेगी। अभी तक इतनी महत्वपूर्ण कविता लिखी ही नहीं गई। पर कवि संतुष्ट नहीं था। 
उसने एक और कविता ढील दी-''धूप होगी अपनी जगह/. गरमी से झुलसे रहे हों मेरे जैसे मनुष्य/  पर मैं चीखूँगा जोर-से गरमी के खिलाफ/... करता रहूँगा हस्तक्षेप / जैसे नदीं करती है चट्टान से बगावत।'' ..फ्रिज से  चिल्ड वाटर निकाल कर कवि ने आगे भी लिखा। और दोनों कविताओं को संपादक के पास भेज दिया। संपादक को कवि अपने शहर में बुला चुका था। उसका अभिनंदन किया था। संपादक को भविष्य में फिर सम्मान की लालसा थी। उसने दोनों कविताओं को प्रकाशित कर दिया। कवि ने अपनी कविता आलोचक के पास भी भेजी। आलोचक पहले से ही के कुछ लाभ उठा चुका था। अपनी पत्रिका के लिए अफसर कवि के सौजन्य से विज्ञापन प्राप्त करने के कारण वह धन्य था। इसलिए अफसर कवि की एक-एक पंक्ति में उसे कहीं निराला, कवि नागार्जुन, कहीं, धूमिल नजर आ रहे थे। समीक्षा छप कर आई तो कवि रातोंरात और अधिक लोकप्रिय हो गया। 

एक दिन फिर कवि के कमरे का एसी बंद था। तब कवि को एसी का महत्व समझ में आया। एसी न चलता, तो कविता न होती। कविता न होती तो वह छपती नहीं। छपती नहीं, तो आलोचक उस पर कुछ लिखता नहीं। लिखता नहीं, तो उसका नाम न होता। इसलिए धन्यवाद है एसी को। कवि फिर एसी चालू होने की प्रतीक्षा कर रहा था। आज वह फिर पसीना बहाने वाले मेहनतकश मनुष्य पर कुछ लिखना चाहता था। मगर एसी फिर बंद था। उसे बड़ी कोफ्त हुई। इन्वर्टर फिर खराब हो गया? उसने मातहत को फटकारा -इतना भ्रष्टाचार क्यों? किसने खरीदा था यह ऐसी? मातहत ने सिर झुका कर कहा- हुजूर, आपने ही तो ...। अफसर चुप हो गया। अब अचानक उसके मन में ईमानदारी पर कविता लिखने का भूत सवार हुआ और जैसे ही लाइट चालू हुई कवि ने कविता लिखी-गिरे हुए लोगों के सहारे उठ नहीं सकता समाज। भ्रष्ट हो कर आदमी रच नहीं सकता एक अच्छी कविता। बहाना पड़ता है लहू और पसीना , तब जा कर बनती है एक कालजयी कविता। लिखने के बाद कवि ने कविता दूसरी पत्रिका को भेज दी। साथ में विज्ञापन भी था। कविता छपनी ही थी। 

 कवि धीरे-धीरे महाकवि में रूपांतरित होता गया। उसने दफ्तर में जो ऊपरी कमाई की , उसे उसने कविता के लिए ही समर्पित कर दिया। अब उसके घर पर भी एसी लग गया है। और वह घर पर भी मूड बना कर किवता वगैरह लिख लेता है। इस कवि से उस कथन को झूठा साबित कर दिखाया है कि कवि दुखी हो, वियोगी हो तो कविता बनती है। कविता दुख-तकलीफ सह कर भी बनती है। मगर यहाँ तो कविता एसी चले बगैर बनती ही नहीं। इस दृष्टि से कवि अपने आप को नई परम्परा का जनक भी समझता है। और बड़ा गदगद  रहता है। 

1 मार्च 2016

झांसे का दूसरा नाम बजट

झांसे का दूसरा नाम बजट
गिरीश पंकज 
वित्त मंत्री उस जीव को कहते हैं जो अपने चित्त से बजट पेश करके जनता को चित कर देता है. जिसके कारण जनता पित्त रोग से परेशान हो जाती है. शरीर को खुजाने लगती है. 
देश की जनता महंगाई  नामक डायन से पहले से ही डरी होती है, पर जैसे ही बजट पेश करने का दिन आता है, वह समझ जाती है कि वित्तमंत्री देश के लोगो से पिछले जन्म का कोई  बदला भुनाएगा। और वित्त मंत्री मुस्कराते हुए बजट पेश करता है.  जनता पानी पी-पी कर उसे कोसती है. 
पिछले दिनों वित्त मंत्री मिल ही  गए, सपने में. वैसे तो मिलने से रहे. जिनके पास भरी-भरकम वित्त होता है, वही वित्त मंत्री से मिल सकता है. 
खैर, सपने में मुलाकात हो गई।  हमने कहा- ''ई का तमाशा है।  बजट है या झांसा है?'' 
वित्तमंत्री हँसे और बोले- ''ऐसा है भोले, बर्फ के गोले, झाँसे का दूसरा नाम ही बजट होता है. बजट में हम ऊंची -ऊंची फेंकते है, जिसे लपेट पाना मुश्किल हो जाता है. जैसे हम कहेंगे 'पांच साल बाद महंगाई ख़त्म', 'किसानो की आय दोगुनी हो जाएगी', 'देश का कालाधन वापस आ जाएगा'। बस, देश की जनता कर का भार अपने करों से उठा ले. जनता को लगता है वित्त मंत्री कह रहा है तो ठीक ही कह रहा होगा. बेचारी चुप कर जाती हैं, हम उसके गम को गलत करने बीड़ी से कर हटा लेते हैं. सोने-चांदी पर बढ़ा देते हैं।  जनता को दुःख भरी जिंदगी से मुक्ति हम जहर को कर मुक्त कर देते हैं.'' 
हमने कहा- ''आपने तो कहा था, हमारी सरकार आएगी तो अच्छे दिन आएंगे? क्या हुआ तेरा वादा?'' 
मेरी बात सुन कर वित्त मंत्री फुसफुसी हँसे - ''भाई, मेरे अपने वादे पर सरकार कायम है. अच्छे दिन आकर रहेंगे. हमसे बच कर वे जाएंगे कहाँ? पहले हम लोगों के अच्छे दिन तो आने दो. हमारे सांसद  हैं, बड़े -बड़े नेता है, उनके बाल-बच्चे हैं. उनके अच्छे दिन आ जाएं, फिर आम लोगों के लिए भी कुछ करेंगे। हम नहीं कर सके, तो अगली सरकार करेगी। अगर वो न कर सकी तो हम उसे चैन से जीने नहीं देंगे। जैसे अभी विपक्ष वाले हमारे साथ कर रहे हैं.''
वित्त मंत्री के उत्तर पर बड़ा गुस्सा आया।  हमने एक पत्थर उठा लिया। मंत्री नहीं, अपना सर फोड़ने के लिए. मगर मंत्री घबरा गया. भाग खड़ा हुआ।  
हम उसके पीछे दौड़े कि '' भाई मेरे, हम अपना सर फोड़ना चाहते हैं और यह शुभकार्य आपके हाथो से हो तो अतिउत्तम। '' 
वित्त मंत्री बोले- ''हम सब समझते हैं  कि हमारे साथ का -का हुई सकत है।  टाटा -टाटा, बाय-बाय.'' 
नींद खुली तो देखा सामने गृहमंत्री जी खड़े हैं.यानी हमारी पत्नी। वो बोली - ''सपने में बजट -बजट क्या बड़बड़ा रहे थे. घर के बजट की चिंता करो. अब रोज एक रोटी कम करो. खाने में शामिल गम करो। पगले, इस देश में बजट गरीबो को नहीं, अमीरो को ध्यान में रख कर बनता है क्योंकि देश को अमीर बनाना है.'' 
मुझे लगा पत्नी कितनी समझदार है. इसे तो वित्तमंत्री होना चाहिए था। लेकिन मैंने उसकी तारीफ़ नहीं की वरना वह दिल्ली तक दौड़ जाती।  
मैंने कहा- ''भगवान, तुम ठीक कहती हो, आज से गम ही खाएंगे. लेकिन पहले चाय तो पी लें। '' 
पत्नी  बोली-''पानी उबाल कर ला रही हूँ. उसे ही चाय समझ कर पी लो.दूध, शककर, चायपत्ती का खर्च बचेगा और भविष्य की समस्याओं से जूझने के लिए सेहत भी ठीक रहेगी।''  
मैं सोचने लगा, पत्नी तो स्वास्थ्य मंत्री भी बन सकती है. पर मैंने कहा नहीं, वरना वह खेल मंत्री बन कर मुझे बोल्ड भी कर सकती थी.

22 अप्रैल 2014

हम न जइबू विमोचन समारोह देखन बाबा !

हम न जइबू विमोचन समारोह देखन बाबा  !गिरीश पंकज
हमारा मित्र पिछले दिनों एक पुस्तक के लोकार्पण में गया और उसने कसम खा ली कि
''हम न जइबू विमोचन समारोह देखन बाबा, माँ क़सम ! ''
मैंने पूछा, ''ऐसा क्या हो गया भाई? और सीधे माँ  कसम?''
मित्र बोला, ''हां, माँ कसम, खाओ तो ढंग  की कसम खाओ. वैसे अब
झूठी कसम ही सही, लेकिन खा लेता हूँ कि अब से किसी विमोचन समारोह में नहीं जाऊँगा। क्योंकि जाने से तो बाते होंगी। एक तो विमोचनकर्ता की झूठी तारीफों को झेलना होगा, या फिर कान बंद करना पड़ेगा। कान बंद कर के बैठना ठीक नहीं होगा, लोग कहेंगे ई बदतमीज़ी है. इसलिए जाना ही ठीक नहीं।''
मैंने पूछा, ''आखिर ऐसी क्या बात हो गयी भाई, कुछ खोल कर कहो.''
मित्र बोला, ''न जाने का तरल नहीं, ठोस कारण हैं. ई ससुरे खा-पी कर अघाये घाघ किस्म के पुराने लेखक-आलोचक जहां जाते हैं, वहां झूठ का पिटारा खोल कर नए लेखक को एकदम से आकाश में चढ़ा देते है. लेखक तो हवाई जहाज से आता है, महंगी शराब पीता  है और दूसरे दिन निकल लेता है कल्टी  मार के, मगर नया बुड़बक लेखक बेचारा दो-चार रात ठीक से सो नहीं पाता क्योंकि वरिष्ठ आलोचक उसे साहित्य का नया अवतार बता देता है, आलोचक की भाषा इतनी मनमोहक और जानलेवा रहती है कि नया लेखक पगलेट-सा घूमता रहता है और एक दिन.....  उसके लेखक का 'द  ऐंड ' हो जाता है.पग्गल न हो तो का करे बेचारा। उस नए लेखक के लिए ऐसी -ऐसी  तारीफ करता है घाघ आलोचक  कि अभी-अभी पैदा हुआ लेखक फूल कर गुब्बारा हुई जाता है. घाघ आलोचक बोलता है, इस नए लेखक ने कमाल कर दिया है। साहित्य सो रहा था, उसको इस नए लेखक ने जगाया है, मतबल यह कि  साहित्य के पुनर्जागरण का श्रेय अगर किसी को जाता है तो इसी साहित्यिक पट्ठे  को जाता है
। ये न होता तो साहित्य अजगर की तरह सोया रहता और पता नहीं, कब तक सोया पड़ा रहता. इस युवा लेखक ने साहित्य को जगाया है. इसके कारण मैं भी जाग गया हूँ. अब तक मुझे लगता था की साहित्य का सबसे बड़ा रचनाकार महीच्च हूँ  मगर इसकी पुस्तक पढ़ने के बाद लगा कि मैं तो इसके पासंग में भी नहीं हूँ। मैं नंबर वन लेखक था, लेकिन अब से मैं 'दो नंबरी' लेखक हो गया हूँ, क्योंकि ये युवा लेखक नंबर वन पर आ गया है. इसके  मुकाबले इस इलाके में अभी कोई लेखक मुझे तो नज़र नहीं आता.''मित्र की बात सुन कर मैंने कहा, ''ठीक कह रहे हो पार्टनर. आलोचक की बात सुन कर नया लेखक धरती की और से निहार रहा होगा  और घबरा भी रहा होगा  कि कहीं  यह धरती फट  न जाए. अगर फट गयी तो सीधे अंदर सामना ही पड़ेगा।''
मित्र बोला, ''ठीक कह रहे हो. विमोचन समारोह में साहित्य  नए-पुराने लोग आलोचक  को सुन रहे थे और मज़ा भी  ले रहे थे कि  देखो, कैसे तारीफों के पुल बाँध कर नए लेखक की अकाल मौत का रास्ता तैयार कर रहा है
।''मैंने कहा, ''यार, आजकल ऐसे तरीफबाज़ लेखको की साहित्य में बड़ी डिमांड है. हर कोई इनको बुलाता है. क्योंकि अगला जी खोल कर तारीफ भी तो करता है. तारीफ करना बुरी बात भी नहीं, एक युवा लेखक बेचारा अमर होने के लिए वरिष्ठ लेखक की हवाई यात्रा का प्रबंध करता है. उसे सितारा होटल में रुकवाता है, उसकी हर ख्वाहिश पूरी करता है, गिफ्ट-शिफ्ट भी देता है. बदले में वरिष्ठ लेखक क्या युवा लेखक को प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध आदि के बरोबर भी खड़ा नकारे तो यह सेवाहरामी (बतर्ज़ नमकहरामी) होगी। लोगो को बुरा लगता है तो  लगता रहे उनकी बला से. जीवन के इतने साल यही सब तो करते हुए काट दिए, कुछ साल और बचे हैं, वे भी कट जायेंगे।''
मित्र बोला, ''कुछ आलोचक बड़ी ऊंची रकम होते हैं।  झुमरी तलैया के लेखक दुखीराम 'सुखी' की पुस्तक के विमोचन में जब गया था, तो उसे भी यही आलोचक मुक्तिबोध और नागार्जुन की टक्कर का कवि बता रहा था. वहाँ  भी ये कह रहा था कि  'दुखीराम 'सुखी' ने हिन्दी साहित्य को जाग्रत करने का काम किया ह। यह युवा कवि मेरे से दस हाथ आगे है. इस इलाके का गौरव है कि इस युवा कवि ने यहां जन्म लिया। धरा धन्य हो गई''.. उस आयोजन के बाद हालत यह हुयी कि  युवा कवि 'दुखीराम' की कोई नयी कविता आज तक कहीं नहीं छपी, उसने लिखी ही नहीं। जब एक बड़ा आलोचक बोल रहा है कि यह मुक्तिबोध और नागार्जुन के टक्कर की कवितायेँ लिख रहा है तो और अधिक लिखना ही क्यों ? जितना लिख लिया, पर्याप्त है. उसे ही भुनाएँगे। तो, आलोचक नए लेखकों को चने के पेड़ में चढ़ा कर ऐसा गिराता है कि  बेचारा दुबारा खड़ा हीं नहीं हो पाता.''
मित्र की बात सुन कर मैं चुप  हो गया, मित्र मुस्का रहा था, फिर बोला, ''यही कारण है कि  मैं अब किसी भी विमोचन समारोह में नहीं जाऊँगा, एक तो मुख्य अतिथि द्वारा नए लेखक की झूठी प्रशंसा  सुनो, और बाद में नए कवि को अकाल मौत मरते देखो। एक और त्रासदी होती है. विमोचन समारोह के बाद युवा कवि घर-बाहर किसी से भी सीधे मुंह बात ही नहीं करता, उसे नमस्ते करो तो  गंभीर चेहरा बना कर मुंडी हिला देता है, बस.''
मित्र की बात सुन कर मैं मौनी बाबा बन कर मुंडी हिलाते रह गया.

20 अगस्त 2013

गरीबी एक मानसिकता है


अभी-अभी हमें ज्ञात हुआ है कि गरीबी और कुछ नहीं, एक मानसिकता है.
जैसे मन चंगा हो तो कठौती में गंगा उतर आती है, उसी तरह मन अच्छा हो तो गरीबी गरीबी नही, अमीरी लगने लगती है।  आजकल हमारे अनेक  नेता प्रवचन दे कर दिल जीत रहे हैं. इनके भाषण सुन लो, तो लगता है अब स्वर्ग उतरने ही वाला है धरा पर. पिछले दिनों एक युवा नेता ने फरमाया कि देश के लोग अपने आप को गरीब समझना छोड़ दें क्योंकि .ये केवल 'डर्टी मेंटल' स्थिति है. गरीब समझोगे तो लगेगा हम गरीब है, तो समझना ही क्यों? भूख लगे तो यही सोचो कि हमरा पेट लबालब भरा हुआ है. प्यास लगे, तो सोचो कि  हम 'पिए हुए' हैं। तब देखो, जीवन का परम-आनंद।''
नेताजी का 'प्रवचन' सुन कर कुछ  गरीब भूख-प्यास से मुक्त हो कर उनसे मिलने पहुँच गये उनके घर. सुरक्षा कर्मी ने उन्हें रोक दिया,''अरे-अरे, कहाँ घुसे चले आ रहे हो ?''
एक गरीब खुद को बड़ा नेता और महा अमीर समझाने लगा था, वह बोला, ''हम लोग दिखते गरीब हैं  लेकिन अपने आप को करोडपति से कम नहीं समझते। हमारे नेता ने ही यह ज्ञान दिया है. हम उनका आभार ज्ञापन करने आये हैं.''
गरीबों की बात सुन कर नेता के चमचे हँस पड़े.एक बोला, ''हमारे बाबा की बातों को सीरियसली मत लिया करो भाई, हम लोग खुद नहीं लेते. जाओ, बाद में मिलने आना.''
गरीब जिद करने लगे कि हम तो मिल कर ही जायेंगे। शोर सुन कर नेताजी बाहर निकले तो गरीब उनकी और लपके। नेताजी घबराए, अरे ये गरीब यहाँ क्या कर रहे हैं. वे पीछे हटने लगे. एक गरीब बोला, ''आप धन्य है. हम आपको प्रणाम करने आये हैं।  जब से आप ने कहा है कि खुद को गरीब मत समझो, हम लोग बड़े सुखी है. अब न भूख लगती हैं न प्यास। हम गरीब हैं मगर खुद को अरबपति समझने लगे है. ये देखिये अम्बानी जी है. वो टाटा है, उधर जो खडा है वो बिडला है. हम सब अमीर है. आपने जो फंडा दिया है न, उससे हम लोग उत्साहित हो गए हैं. अब हम लोग अपने को गरीब ही नहीं समझते, और मंत्री से भी कम नहीं समझते। उस असरदार आदमी को देखें, कहता है मै प्रधानमंत्री हूँ. और उस भिखारन को देखिये, वो भी खुद को कुछ -न -कुछ बताती रहती हैं. तो, आपका बड़ा अहसान हो गया हम पर. आज लग रहा है कि सचमुच गरीबी एक मानसिक स्थिति है. भूखे रह कर भी हम ऐश कर रहे है. ज़िंदगी के सारे मज़े कैश कर रहे है. जब जैसा मूड होता है, वैसे बन जाते है. मौजा ही मौजा है''
नेताजी जी गदगद। उनकी आँखों से अश्रु बहने लगे. वे बोले, ''अब इस देश से गरीबी हट कर रहेगी। हमारी दादी जी बड़ी चिन्ता करती थी कि गरीबी ह्टे, अब वो हट कर रहेगी। आप लोग मेरी बात को समझ गए मतलब आपकी मानसिक स्थिति अच्छी है. अरे, हम खुद यही सोचते है कि इस देश के राजा हैं और आने वाले कई वर्षो तक यहाँ राज करेंगे। ऊंची सोच रखो. अच्छा,तो हम चलते हैं.''
एक गरीब बोला, ''आपके लिए अभिनंदन पत्र लाये हैं, स्वीकार कीजिये.'' युवा नेता  को अभिनंदन पत्र नज़र नहीं आया तो  एक गरीब बोला, ''आप सोचिये कि आपके हाथ अभिनंदन पत्र है। ''  नेता जी मुस्कराए और आगे बढ़ गये.

22 मई 2012

भेडिये के कार्टून..


भेडिये के कार्टून..
गिरीश पंकज 
कुछ नेता नहा-धो कर कार्टूनिस्टों के पीछे पड़ गए थे. वे बेचारे कार्टून बनाना चाहते हैं. यह उनकी आदत है मगर  नेता चाहते हैं, कार्टून न बनाए जाएँ. कार्टूनिस्टों पर हमले हो रहे है. जान  का ख़तरा हो गया है. तो करें क्या? एक दिन सारे कार्टूनिस्ट मिले और विचार करने लगे.
एक कार्टूनिस्ट ने कहा, ''अब तो एक ही रास्ता है. कार्टून बनाना ही बंद  कर दिया जाये.''
''ऐसे में तो हमारा जीना कठिन हो जाएगा. कार्टून बनाना हमारा धर्म है. जहा विसंगति नज़र आयेगी, हमारी तूलिका चलेगी.'' एक कार्टूनिस्ट उत्तेजित हो कर बोला. उसको शांत करते हुए दूसरे कार्टूनिस्ट ने समझाया, ''देखो प्यारेलाल,  जान है तो जहान है. कुछ दिन शांत रहो. लोग शांत हो जाएँ उसके बाद फिर शुरू हो जाना.'' 
''लेकिन हम तो बिना कार्टून बनाए रह नहीं सकते.'' एक कार्टूनिस्ट ने कहा, तो सब सोचने लगे, 'बात ठीक है. कुछ तो रास्ता निकले. सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे'.
अचानक एक सीनियर कार्टूनिस्ट  ''यूरेका-यूरेका'' कहते हुए खुशी से नाचने लगा. सब खुश हो गए कि कोई धाँसू आइडिया सूझा है. सीनियर कार्टूनिस्ट ने कहा, ''भाइयों, एक रास्ता है,. उस पर चल कर हम अपना अभियान जारी रख सकते है. बस हमें नेताओं की जगह जानवरों के चित्रों का इस्तेमाल करना होगा.''
लोग सीनियर कार्टूनिस्ट की बात को समझे नहीं पाए, तो कार्टूनिस्ट ने सबको विस्तार से समझाया. बस उस दिन से कार्टूनिस्ट निश्चित हो कर अपने  काम पर लग गए. अब कोई कार्टूनिस्ट किसी नेता का कार्टून नहीं बनाता.  व्यंग्यचित्रकार जंगल की ओर या कहें कि पशुओं की ओर मुड़ गए थे. यानी उनके कार्टूनों में अब 'भेडिये', 'लोमड़ी', 'गीदड़', 'गधे', 'सूअर', 'कुत्ते' आदि नज़र आने लगे.  वे निश्चिन्त थे..  जानवरों पर बने कार्टून देख कर किसी नेता को बुरा नहीं लग रहा था.. लेकिन  पशुओं में हलचल थी कि हम पर कार्टून बना कर मनुष्य हमारा अपमान कर रहा है. हमें नेताओं जैसा समझ रहा है. यह ठीक नहीं. पशुओं के नेता ने कहा, ''भाई, कलजुग है. यह सब हमें झेलना ही पडेगा.'' सारे पशु चुप  हो गए. लेकिन नेताओं के चमचे चुप नहीं थे. वे समझ गए कि कार्टूनिस्टों ने प्रहार करने का नया तरीका निकाला है.
कान भरने की कला में माहिर  एक चमचे ने एक नेता के पास एक कार्टून पेश करते हुए कहा, ''देख रहे हो भैयाजी इन सालों की हरकते? आप पर कार्टून बना रहे हैं. कहो तो कर दें काम तमाम?''
भैयाजी ने कार्टून को देखा और हँसते हुए  कहा, तुम भी पूरे बुडवक हो. ये तो किसी भेडिये पर कार्टून है, मुझ पर नहीं.''
 चमचा बोला, ''भेडिये की आड़ ले कर आप पर कार्टून बनाया गया है. आप कुछ तो समझो.''
भैया जी ने कार्टून को बड़े गौर से देखा. उन्हें कुछ समझ में नहीं आया. वे बोले, यार यूं पढ़े-लिखे लोगों के साथ यही दिक्कत है. इसीलिये हम ज्यादा नहीं पढ़े. ज्यादा पढ़ों तो दिमाग तेजी से चलने लगता है. हर चीज़ में खोट नज़र आता है. भेडिये -लोमड़ी पर कार्टून है और तुमको लग रहा है, मुझ पर व्यंग्य किया है.''
चमचा निराश हो गया कि भैयाजी उसकी बात नहीं समझ रहे है तो उसने कुछ खुल कर कहने की कोशिश की, ''देखिये आप सुर-सुन्दरी के प्रेमी है. रात आपकी रंगीन रहती है. कार्टूनिस्ट ने भेडिये को कुर्सी पर बिठा कर यही तो बताया है.''
इतना सुनाना था कि भैया जी भड़क उठे. ''अच्छा, उस ससुरे कार्टूनिस्ट की इतनी हिम्मत? फ़ौरन उसे निबटा दिया जाये लेकिन संभल कर आजकल लोग बड़े जागरूक हो गए है. मैं लपेटे में न ले लिया जाऊं सावधान रहना. अभी बहुत ऐश करना है. बोले तो देश की सेवा करनी है.''
 चमचा बोला, ''फिकर नाट  हम हूँ न...''
भैया जी आश्वस्त हो कर मोबाईल में रखी कोई  नीली फिल्म देखकर अपना ज्ञान बढ़ाने में व्यस्त हो गए. चमचा अपने 'काम' पर लग गया.

16 मार्च 2011

'ऑफ दि रिकार्ड' की जय हो ...

दूसरे को गाली दे दो, फिर कहो - 'यह ऑफ दि रिकार्ड है।' 
नेताओं का तकिया कलाम है - 'ऑफ दि रिकार्ड'। मन की भड़ास निकाल कर उस पर 'ऑफ दि रिकार्ड' चस्पा कर दो।
एक नेताजी पत्रकारों से गुफ्तगू कर रहे थे। जब भी मौका लगता है, पत्रकारों के बीच चले आते हैं : जैसे प्यासा कुएँ के पास। प्रचार की खुराक से नेता का जीवन चलता है। प्रचार न मिले तो मर जाए, बेचारा। तो, नेताजी पत्रकारों से चर्चा कर रहे थे। देश की, समाज की, कल की, आज की। फिर धीरे से हीरोइन की कमर पर अपना ज्ञान बघारने लगे। सहसा उन्हें ध्यान आया कि वह पत्रकारों के बीच हैं, अपने खास चमचों के बीच नहीं, तो घबराए और बोले - ''बंधुवर, ये ऑफ दि रिकार्ड है, ध्यान रहे।''
भ्रष्टाचार पर नेताजी बोलने लगे - ''देश का पतन हो रहा है साहब! देश में मैं भी रहता हूँ। मेरा भी पतन हो सकता है। फिलहाल तो बचा हुआ हूँ। लेकिन वो नेता है न, लतखोरीलाल। नंबर एक का भ्रष्टाचारी है। उसका पूरा खानदान भ्रष्टाचारी है। अपनी पार्टी का नेता है लेकिन हरकतें विरोधियों जैसी करता है। मेरी चले तो दो मिनट में पार्टी से हकाल बाहर करूँ। बहुत भ्रष्ट है। न खुद खाता है, न दूसरों को खाने देता है। ऐसे लोग राजनीति में रहेंगे तो हमारा क्या होगा? और बता दूँ,कि उसकी पत्नी भी भ्रष्टाचारी है।''
नेताजी इतना बोलकर रुके, फिर धीरे से बोले - ''अरे भई, अभी जितना कुछ बोला है, उसे 'ऑफ दि रिकार्ड' समझना, वरना मेरी तो फजीहत हो जाएगी। ससुरी ये जुबान जब देखो बकर-बकर करती रहती है। चमड़े की है न। उचकती रहती है। मेहरबानी करना जी। ये सब छप न पाए।''
पत्रकारों ने छुटभैये नेता को पहले भी कोई भाव नहीं दिया था। अब भी नहीं दे रहे थे लेकिन बेचारे 'बकरवादी' होने के कारण घबरा-से गए थे कि अगर मेरा बयान छप-छुपा गया तो लोग दौड़ा-दौड़ा कर पीटेंगे। अधिकांश पत्रकार भी नैतिकता में बंधे रहते हैं। (वैसे कुछ के लिए नैतिकता-फैतिकता का कोई अर्थ नहीं होता) किसी ने कह दिया 'ऑफ दि रिकार्ड' तो फिर 'ऑफ दि रिकार्ड'। फिर वह 'ऑन दि रिकार्ड' नहीं होता। और बहुत सारे नेता इसी 'ऑफ दि रिकार्ड' की आड़ में जी-भर कर अपनी कुंठा, भड़ास आदि-आदि निकाल लेते हैं। एक तरह से वे अपने चेहरा पत्रकारों के सामने खोलकर रख देते हैं और वक्त जरूरत पर उसकी मरम्मत करता है। 'ऑफ दि रिकार्ड' नहीं, 'ऑन दि रिकार्ड'।
हम लोगों की ज़िदगी का अधिकांश हिस्सा 'ऑफ दि रिकार्ड' होता है। 'ऑन दि रिकार्ड' जो कुछ होता है। वह काफी चिकना-चुपड़ा होता है। यूँ समझ लो कि 'बाथरूम आदि' ऑफ दि रिकार्ड है और ड्राइंग रूम 'ऑन दि रिकार्ड' बड़े से बड़ा तोपचंद 'ऑफ दि रिकार्ड' होता है और 'ऑन दि रिकार्ड' भी होता है।
एक सज्जन बोले - ''मेरा जीवन तो एक खुली किताब है।''
जब लोगों ने किताब को पलटाया तो पता चला सारे पन्ने पाखंडरूपी दीमक चाट गए हैं।
हमने पूछा - ''श्रीमान, आपकी खुली किताब के सारे पन्ने तो दीमक-ग्रस्त हैं'', तो वह चट् से मुसकरा पड़े और बोले- ''ये 'ऑफ दि रिकार्ड' मामला है।''
अब अपनी भी एक बात आपके सामने खोल ही दूँ। दरअसल मैं क्यों व्यंग्य लिखने बैठा था। यह 'ऑफ दि रिकार्ड'बात है, जबकि 'ऑफ दि रिकार्ड' यह है कि व्यंग्य आखिरी-आखिरी में आकाशवाणी-मार्का चिंतन में बदल गया। समझदार पाठक समझ सकते हैं बदले हुए ट्रैक को।
अनेक सज्जनों की बुराइयाँ 'ऑफ दि रिकार्ड' रह जाती हैं तो तथाकथित बुरे लोगों की अच्छाइयाँ भी 'ऑफ दि रिकार्ड'नहीं आ पाती। यह जीवन इसी तरह चलता रहता है।
वे लोग जीवन में सुखी रहते हैं जो दूसरों के फटे में पैर नहीं डालते। मतलब उनके 'ऑफ दि रिकार्ड' को 'ऑन दि रिकार्ड' करने की कोशिश नहीं करते। जब-जब कोई 'महापुरुष' ऐसी हरकत करता है, दूसरा महापुरुष भी उनके जीवन के 'ऑफ दि रिकार्ड' ढूँढने लगता है। कुछ लोग हर समय एक-दूसरे के 'ऑफ दि रिकार्ड' की खोज में लगे रहते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए 'छिद्रान्वेषी' जैसे शब्द का जन्म हुआ है। आजकल मीडिया में इस तरह के खोजी बढ़ते जा रहे हैं।
पिछले दिनों एक अखबार ने कमाल कर दिया। विधानसभा में एक विधायक ने दूसरे विधायक के प्रति अपशब्द कह दिए। सदन ने उन शब्दों को विलोपित कर दिया, लेकिन रिपोर्टर बेचारा अति उत्साहित था। उसने अपने अखबार में उन शब्दों को भी प्रकाशित कर दिया। विधानसभा अध्यक्ष बेचार सिर पीटने लगे।
उन्होंने अखबार के संपादक से कहा, ''अपने पत्रकारों को कुछ सिखाइए। सदन में जो बात ऑफ दि रिकार्ड होती है, उसे छापा नहीं करते।''
इस पर संपादक जी भड़क गए- ''वाह, क्यों नहीं छाप सकते? आखिर विधायक ने गाली दी थी कि नहीं?''
''अरे, दी तो थी मगर उन शब्दों को विलोपित कर दिया गया था। ऐसे शब्दों को प्रकाशित नहीं किया जा सकता। यह आचार संहिता के विरुद्ध है।'' 
''लेकिन हम विलोपित नहीं कर सकते। हम प्रजातंत्र के चौथे खंभे हैं। गणेशशंकर विद्यार्थी की परम्परा वाले हैं। हम तो भाई, जो घटा है, वही लिखते हैं। माफ करें।''
विधानसभा अध्यक्ष महोदय अब क्या करते। उन्होंने खिसयानी बिल्ली की तरह अपने बालों को ही नोंचना शुरू कर दिया। और बोले, ''ठीक है प्रभु, जैसी आपकी मरजी।''
तो ऑफ दि रिकार्ड बड़ा रोचक शब्द है। इसका भी अपना रिकार्ड होता है। मीडिया वाले ऐसे ही नेताओं को खोज-खोज कर उनकी 'बाइट' लेते हैं, जो 'ऑफ दि रिकार्ड' बोल कर भी चाहते हैं, जग जाहिर कर दो। इसी बहाने में चर्चा में तो बने रहेंगे।